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04 February, 2011

Eshavasyopnishad


ईशावास्योपनिषद्
शान्तिपाठः
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
अथ मन्त्राः
ईशावास्यमिदँसर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥
हिन्दी अनुवाद :- विश्व में जो कुछ भी (चर या अचर) वस्तु है, वह सब ईश्वर से आच्छादित है । अतः उसका त्यागपूर्वक उपभोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो । (यानि यह धन किसका है ? किसी का नहीं !)
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँसमाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥२॥
हिन्दी अनुवाद :- इस लोक में (शास्त्र-विहित) कर्मों को करते हुए ही सौ वर्ष जीवित रहने की इच्छा करे । इस प्रकार तुझमें (मानव में) कर्म लिप्त नहीं होता है । इससे इतर अन्य कोई मार्ग नहीं है ।
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥३॥
हिन्दी अनुवाद :- प्राणादि की तृप्ति में निरत अज्ञानियों के जो प्रसिद्ध, (ज्ञान रूपी) प्रकाश से रहित, अज्ञानान्धकार से आच्छादित (व्याप्त) लोक हैं । जो आत्मघाती जन, मरकर उन लोकों में जाते हैं ।
अनेजदेकं मनसो जवीयो, नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् ।
ताद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥४॥
हिन्दी अनुवाद :- वह ब्रह्म ; अचल अर्थात् स्वरूप से अच्युत, (समस्त भूतों में) एक अर्थात् अद्वय, मन से भी अधिक वेगवान् या तीव्रगति, तथा सर्वत्र पहले से ही पहुँचा हुआ है । (चक्षुरादि) इन्द्रियाँ उस तक नहीं पहुँच सकीं । वह अचल या स्थित रहते हुए भी, दौड़ते हुए अन्य किसी का उल्लङ्घन-अतिक्रमण- किए हुए है । उसमें अर्थात् उसके आश्रय से वायु जल को धारण करता है ।
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य, तदु सर्वास्यास्य बाह्यतः ॥५॥
हिन्दी अनुवाद :- वह (आत्मा/ब्रह्म) गतिशील है, वह गतिशील नहीं (भी) है । वह दूर है, और समीप (भी) है । वह इस सब (विश्व) के भीतर है, और इस सब के बाहर (भी) है ।
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं, ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
हिन्दी अनुवाद :- फिर जो ज्ञानी व्यक्ति (अव्यक्त से लेकर चराचर-पर्यन्त) समस्त भूतों को आत्मा में ही देखता है, तथा समस्त भूतों में आत्मा को ही देखता है, वह उस (अभेद-दर्शन) के कारण (किसी से) घृणा नहीं करता ।
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
हिन्दी अनुवाद :- जिस अवस्था में आत्मा का विशेष ज्ञान-साक्षात्कारात्मक ज्ञान-प्राप्त किये हुए योगी की दृष्टि में समस्त चराचर जगत् आत्मा (ब्रह्म) ही हो गया, उस अवस्था में ऐसे एकत्वको देखने (अनुभव करने) वाले ज्ञानी को कैसा मोह और कैसा शोक ? (अर्थात् वह शोक/मोह से परे हो जाता है) ।
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण-
मस्नाविरँशुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्य-
तोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥८॥
हिन्दी अनुवाद :-  वह (ब्रह्म) सर्व-व्यापक, शुक्ल (दीप्तिमान्), शरीर से रहित, क्षत (घाव) से रहित, स्नायु-तन्तुओं (शिराओं, नसों) से रहित, निर्मल (अविद्यादि मल से रहित), पापों (धर्माधर्म जनित) से रहित सर्वज्ञ (ज्ञानी), सर्वोपरि स्थित एवं स्वयंसिद्ध है । वह परमेश्वर नित्य प्रजाओं (संवत्सराख्य प्रजापतियों- शा०भा०) के लिए यथार्थ रूप से पदार्थों का विधान करता है ।
अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाँरताः ॥९॥
हिन्दी अनुवाद :- जो मनुष्य केवल ‘अविद्या’ अर्थात् विद्या (देवता ज्ञान) से भिन्न (अग्निहोत्रादि) देव-कर्म की उपासना करते हैं, वे (जन्म-मरण रूप) घोर अन्धकार में पड़ते हैं । और जो लोग उसे छोड़कर केवल देव-विद्या की प्राप्ति में ही लीन रहते हैं, वे तो उनसे भी अधिक अज्ञान रूप अन्धकार में डूब जाते हैं ।
अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥१०॥
हिन्दी अनुवाद :- विद्या के द्वार फल (साध्य) दूसरा ही बतलाते हैं, और अविद्या के द्वारा (साध्य फल) दूसरा । इस प्रकार (हमने) बुद्धिमानों के (वचन) सुने हैं, जिन्होने हम लोगों के लिए उस (कर्म और ज्ञान) की व्याख्या की थी ।
विद्या चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँसह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥११॥
हिन्दी अनुवाद :- जो मनुष्य विद्या-देवता-ज्ञान, और अविद्या-अग्निहोत्रादि शास्त्र-विहित कर्म, इन दोनों को साथ-साथ अर्थात् एक ही पुरुष द्वारा अनुष्ठेय जानता है, वह अविद्या (कर्म) के द्वारा ‘मृत्यु’ – मारक चित्तमल (अर्थात् तज्जन्य स्वाभीविक या सहज कर्म और ज्ञान ) को पार करके, विद्या (देवता-ज्ञान) के द्वारा ‘अमृत’ (देवतात्मभाव) को प्राप्त कर लेता है ।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भृत्याँरताः ॥१२॥
हिन्दी अनुवाद :- जो अव्यक्त प्रकृति की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं । (और) जो केवल व्यक्त अर्थात् कार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) की उपासना में निरत रहते हैं, वे उससे भी अधिक (घोरतर) अन्धकार में पड़ते हैं ।
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥१३॥
हिन्दी अनुवाद :- (ऋषियों ने) कार्य ब्रह्म (की उपासना) से दूसरा (भिन्न) ही फल कहा है, और अव्यक्त प्रकृति (की उपासना) से दूसरा ही । इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुषों के वचन (हमने) सुने हैं, जिन्होने हमसे उसकी व्याख्या की है ।
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयँसह ।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वाऽसम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥१४॥
हिन्दी अनुवाद :- जो उन दोनों, प्रकृति और विनाशी कार्य ब्रह्म, को साथ-साथ (फल देने वाला) जानता है, वह ‘विनाश’ अर्थात् हिरण्यगर्भ नामक कार्य ब्रह्म की उपासना से ‘मृत्यु’ (अर्थात् अनैश्वर्य-असमृद्धि से उत्पन्न दुःख-समूह) को पार करके ‘असम्भूति’ (अर्थात् समस्त भूतों की कारण-भूत प्रकृति) की उपासना से ‘अमृत’ (अमृतत्व अर्थात् प्रकृति-लय) को प्राप्त कर लेता है ।
हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं  पूष्न्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥१५॥
हिन्दी अनुवाद :- हे जगत्पोषक सूर्य ! ‘सत्य’ (आप के ज्योतिर्मय मण्डल में स्थित ब्रह्म) का द्वार देदीप्यमान पात्र से ढका हुआ है । उस ‘सत्य’ को (हृदय में) धारण करने वाले (अथवा, यथार्थ धर्म का अनुष्ठान करने वाले) मुझको दर्शन देने के लिए, उसे हटा लीजिए ।
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजो,
यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि ।
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥१६॥
हिन्दी अनुवाद :- हे सर्व पोषक ! हे एकचारिन् (एकाकी भ्रमण करने वाले) ! [अथवा, जगत् के एकमात्र द्रष्टा (चक्षु) ! –बृ० ५/५१ क०श०भा०] हे सर्व नियामक ! हे सूर्य ! हे प्रजापति के पुत्र ! अपनी किरणों को हटा लीजिए और तेज को समेट लीजिए । आपका जो अतिशय कल्याणमय स्वरूप है, उसे मैं आपके अनुग्रह से देख रहा हूँ । जो वह (अर्थात् आपके सुन्दर तेजोमण्डल में स्थित) है, एवं जो मेरे प्राणों (हृदय) में (रचा-बसा) पुरुष है वही मैं हूँ ।
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तँशरीरम् ।
ॐ क्रतो स्मर कृतँस्मर, क्रतो स्मर कृतँ स्मर ॥१७॥
हिन्दी अनुवाद :- हे संकल्पात्मक अग्निदेव ! मेरा अध्यात्म (आभ्यन्तरिक) प्राण-वायु अविनाशी अधिदैवत (बाह्य) वायु-तत्त्व अर्थात् सूत्राख्य मुख्य प्राण को प्राप्त हो जाय । अनन्तर यह स्थूल शरीर भस्मसात् हो जाय , हे संकल्पात्मक (या यज्ञात्मक) हे अग्निदेव ! (‘अद्यावधि’ अनुष्ठित मेरे) कृत्य को याद करें ।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो  भूयिष्ठां  ते  नमउक्तिं विधेम ॥१८॥
हिन्दी अनुवाद :- हे अग्निदेव ! हमारे सम्पूर्ण कर्मों को जानने वाले आप (शोभनकर्मफलभोग रूप) ऐश्वर्य के लिए हमें अच्छे मार्ग से ले चलिए । हमसे कुटिल मार्गानुसरण रूप पाप को अलग कर दीजिए (अर्थात् हमें विपरीत मार्ग पर चलने से बचाइए) हम आपके लिए अत्यधिक (अनेक बार) नमस्कार-वचन कहते हैं ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः!!!


28 January, 2011

Kenopanishada : Spiritual tradition of India


केनोपनिषद्
येनेरिताः प्रवर्तन्ते प्राणिनः स्वेषु कर्मसु ।

तं वन्दे परमात्मानं स्वात्मानं सर्वदेहिनाम् ॥
यस्य पादांशुसंभूतं विश्वं भाति चराचरम् ।
पूर्णानन्दं गुरुं वन्दे तं पूर्णानन्दविग्रहम् ॥
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु मनाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोतमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरण मस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
      मेरे अङ्ग पुष्ट हों तथा मेरे वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत, बल और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ पुष्ट हों । यह सब उपनिषद्वेद्य ब्रह्म है । मैं ब्रह्म का निराकरण न करूँ । ब्रह्म मेरा निराकरण न करें [अर्थात् मैं ब्रह्म से विमुख न होऊँ और ब्रह्म मेरा परित्याग न करे] इस प्रकार हमारा परस्पर अनिराकरण हो, अनिराकरण हो । उपनिषदों में जो धर्म हैं वे आत्मा (आत्मज्ञान) में लगे हुए मुझमें हों, वे मुझमें हों । त्रिविध ताप की शान्ति हो !!!
प्रथम खण्ड
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः , केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोतं क उ देवो युनक्ति ॥१॥
       यह मन किसके द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विषयों में गिरता है ? किससे प्रयुक्त होकर प्रथम (प्रधान) प्राण चलता है ? प्राणी किसके द्वारा इच्छा की हुई यह वाणी बोलते हैं ? और कौन देव चक्षु तथा श्रोत्र को प्रेरित करता है ? ॥१॥
श्रोत्रस्य श्रोतं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य
प्राणश्चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः  प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥२॥

        जो श्रोत्र का श्रोत्र, मन का मन और वाणी का भी वाणी है वही प्राण का प्राण और चक्षु का चक्षु है [ऐसा जानकर] धीर पुरुष संसार से मुक्त होकर इस लोक से जाकर अमर हो जाते हैं ॥२॥
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनु शिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥३॥
          वहाँ (उस ब्रह्म तक) नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती, वाणी नहीं जाती, मन नहीं जाता । अतः जिस प्रकार शिष्य को इस ब्रह्म का उपदेश करना चाहिए, वह हम नहीं जानते— वह हमारी समझ में नहीं आता । वह विदित से अन्य ही है तथा अविदित से भी परे है— ऐसा हमने पूर्व— पुरुषों से सुना है, जिन्होने हमारे प्रति उसका व्याख्यान किया था ॥३॥
यद्वाचानभ्युदितं     येन    वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥४॥
           जो वाणी से प्रकाशित नहीं है, किन्त्य् जिससे वाणी प्रकाशित होती है उसी को तू ब्रह्म जान, जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥४॥
यन्मनसा  न  मनुते  येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५॥
           जो मन से मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है उसी को ब्रह्म जान । जिस इस [देश- कालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥५॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूँषि पश्यति ।
तदेव ब्रह्म  त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥६॥
          जिसे कोई नेत्र से नहीं देखता बल्कि जिसकी सहायता से नेत्र [अपने विषयों को] देखते हैं उसी को तू ब्रह्म जान । जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥६॥
यच्छ्रोत्रेण  न शृणोति  येन श्रोतमिदँश्रुतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥७॥
          जिसे कोई कान से नहीं सुनता बल्कि जिससे श्रोतेन्द्रिय सुनी जाती है उसी को तू ब्रह्म जान । जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥७॥
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥८॥
          जो नासिकारन्ध्र प्राण के द्वारा विषय नहीं किया जाता, बल्कि जिससे प्राण अपने विषयों की ओर जाता है उसी को तू ब्रह्म जान । जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥८॥
द्वितीय खण्ड
यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नुमीमाँस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥१॥
         यदि तू ऐसा मानता है कि ‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ’ तो निश्चय ही तू ब्रह्म का थोड़ा-सा रूप ही जानता है । इसका जो रूप तू जानता है और इसका जो रूप देवताओं में विदित है [वह भी अल्प ही है] अतः तेरे लिए ब्रह्म विचारणीय ही है । [तब शिष्य ने एकान्त देश में विचार करने के अनन्तर कहा— ] ‘मैं ब्रह्म को जान गया— ऐसा समझता हूँ’ ॥१॥
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥२॥
        मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्म को अच्छी तरह जान गया और न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता । इसलिए मैं उसे जानता हूँ [ और नहीं भी जानता ] । हम शिष्यों में से जो उसे ‘न तो नहीं जानता हूँ और न जानता ही हूँ’ इस प्रकार जानता है वही जानता है ॥२॥
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां   विज्ञातमविजानताम् ॥३॥
          ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है उसी को ज्ञात है और जिसको ज्ञात है वह उसे नहीं जानता : क्योंकि वह जानने वालों का बिना जाना हुआ है और न जानने वालों का जाना हुआ है [क्योंकि अन्य वस्तुओं के समान  दृश्य न होने से वह विषय रूप से नहीं जाना जा सकता ] ॥३॥
प्रतिबोधविदितं  मतममृतत्त्वं  हि  विन्दते ।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥
          जो प्रत्येक बोध (बौद्ध प्रतीति)— में प्रत्यगात्मरूप से जाना गया है वही ब्रह्म है— यही उसका ज्ञान है, क्योंकि उस ब्रह्म ज्ञान से अमृत की प्राप्ति होती है । अमृतत्त्व अपने ही से प्राप्त होता है, विद्या से तो अज्ञानान्धकार को निवृत्त करने का सामर्थ्य मिलता है ॥४॥
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥५॥
           यदि इस जन्म में ब्रह्म को जान लिया तब तो ठीक है और यदि उसे इस जन्म में न जाना तब तो बड़ी भारी हानि है । बुद्धिमान लोग उसे समस्त प्राणियों में उपलब्ध करके इस लोक से जाकर (मरकर)
अमर हो जाते हैं ॥५॥
तृतीय खण्ड
यक्षोपाख्यानम्
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये  देवा  अमहीयन्त ॥१॥
            यह प्रसिद्ध है कि ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की । कहते हैं, उस ब्रह्म की विजय में देवताओं ने गौरव प्राप्त किया ॥१॥
त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ।     तद्धैषां  विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्याजानत किमिदं यक्षमिति ॥२॥
             उन्होने सोचा हमारी ही यह विजय है और हमारी ही यह महिमा है । कहते हैं, वह ब्रह्म देवताओं के अभिप्राय को जान गया और उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ । तब देवता लोग [यक्षरूप में प्रकट हुए] उस ब्रह्म को ‘यह यक्ष कौन है?’ ऐसा न जान सके ॥२॥

तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥३॥
         उन्होने अग्नि से कहा— हे अग्ने ! इस बात को मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ?  उसने कहा —      ‘बहुत अच्छा’ ॥३॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जात—वेदा वा अहमस्मीति ॥४॥
          अग्नि उस यक्षके पास गया । उसने अग्नि से पूँछा- ‘तू कौन है ?’ उसने कहा— ‘मैं अग्नि हूँ, मैं निश्चय जातवेदा ही हूँ’ ॥४॥
तस्मिँस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति॥५॥
         [फिर यक्ष ने पूछा--] ‘उस [जातवेदारूप] तुझमें सामर्थ्य क्या है ?’ [अग्नि ने कहा—] ‘पृथिवी में यह जो कुछ है उस सभी को जला सकता हूँ’ ॥५॥
तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥६॥
         तब यक्ष ने उस अग्नि के लिए एक तिनका रख दिया और कहा— ‘इसे जला’। अग्नि उस तृण के समीप गया, परन्तु अपने सारे वेग से भी उसे जलाने में समर्थ नहीं हुआ । वह उसके पास ही लौट आया और बोला— ‘यह यक्ष कौन है— इस बात को मैं नहीं जान सका’ ॥६॥
अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥७॥
         तदनन्तर, उन देवताओं ने वायु से कहा— ‘हे वायो ! इस बात को मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ?’ उसने कहा— ‘बहुत अच्छा’ ॥७॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥८॥
         वायु उस यक्ष के पास गया, उसने वायु से पूछा— ‘तू कौन है ?’ उसने कहा— ‘मैं वायु हूँ—   मैं निश्चय मातरिश्वा ही हूँ’ ॥८॥
तस्मिँस्त्वयि  किं  वीर्यमित्यपीदँसर्वमाददीय  यदिदं पृथिव्यामिति ॥९॥
         [तब यक्ष ने पूछा— ‘उस [मातरिश्वा] तुझमें क्या सामर्थ्य है ?’ [वायु ने कहा--] ‘पृथिवी में यह जो कुछ है उस सभी को ग्रहण कर सकता हूँ’ ॥९॥
तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं  स  तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥१०॥
           तब यक्ष ने उस वायु के लिए एक तिनका रखा और कहा— ‘इसे ग्रहण कर ।’ वायु उस तृण के समीप गया । परन्तु अपने सारे वेग से भी वह उसे ग्रहण करने में समर्थ न हुआ । तब वह उसके पास से लौट आया और बोला— ‘यह यक्ष कौन है— इस बात को मैं नहीं जान सका’ ॥१०॥
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥११॥
        तदनन्तर देवताओं ने इन्द्र से कहा— ‘मघवन् ! यह यक्ष कौन है— इस बात को मालूम करो ।’ तब इन्द्र ‘बहुत अच्छा’ कह उस यक्ष के पास गया, किन्तु वह इन्द्र के सामने से अन्तर्ध्यान हो गया ॥११॥
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाँहैमवतीं ताँहोवाच किमेतद्यक्षमिति ॥१२॥
         वह इन्द्र उसी आकाश में [जिसमें कि यक्ष अन्तर्धान हुआ था] एक अत्यन्त शोभामयी स्त्री के पास आया और उस सुवर्णाभूषणभूषिता [अथवा हिमालय की पुत्री] उमा (पार्वती रूपिणी ब्रह्मविद्या) से बोला— ‘यह यक्ष कौन है ?’॥१२॥
चतुर्थ खण्ड
उमा का उपदेश
सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥१॥
        उस विद्यादेवी ने स्पष्टया कहा— ‘यह ब्रह्म है’ तुम ब्रह्म के ही विजय में इस प्रकार महिमान्वित हुए हो ’। कहते हैं, तभी से इन्द्र ने यह जाना कि यह ब्रह्म है ॥१॥
तस्माद्वा एते देवो अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्योनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥२॥
      
         क्योंकि अग्नि, वायु और इन्द्र— इन देवताओं ने ही इस समीपस्थ ब्रह्म का स्पर्श किया था और उन्होने ही उसे पहले-पहल ‘यह ब्रह्म है’ ऐसा जाना था, अतः वे अन्य देवताओं से बढ़कर हुए ॥२॥
तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥३॥
         इसलिए इन्द्र अन्य सब देवताओं से बढ़कर हुआ; क्योंकि उसने ही इस समीपस्थ ब्रह्म का स्पर्श किया था— उसने ही पहले-पहल ‘यह ब्रह्म है’ इस प्रकार इसे जाना था ॥३॥
तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा३ इतीन्न्यमीमिषदा ३ इत्यधिदैवतम् ॥४॥
          उस ब्रह्म का [उपासना-सम्बन्धी] यह आदेश है । जो बिजली के चमकने के समान तथा पलक मारने के समान प्रादुर्भूत हुआ वह उस ब्रह्म का अधिदैवत रूप है ॥४॥
अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णँसङ्कल्पः ॥५॥
 
          इसके अनन्तर आध्यात्म उपासना का उपदेश कहते हैं— यह मन जो जाता हुआ-सा कहा जाता है वह ब्रह्म है—इस प्रकार उपासान करनी चाहिए, क्योंकि इससे ही यह ब्रह्म का स्मरण करता है और निरन्तर संकल्प किया जाता है ॥५॥
        किं च—
तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनँसर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥६॥
          वह यह ब्रह्म ही वन (सम्भजनीय) है । उसकी ‘वन’ — इस नाम से उपासना करनी चाहिए । जो उसे इस प्रकार जानता है उसे सभी भूत अच्छी तरह चाहने लगते हैं ॥६॥
उपनिषदंच् भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मी वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥७॥
            [शिष्य के यह कहने पर कि] हे गुरो ! उपनिषद् कहिए [गुरु ने कहा] ‘हमने तुझसे उपनिषद् कह दी । अब हम तेरे प्रति ब्राह्मणजातिसम्बन्धिनी उपनिषद् कहेंगे’ ॥७॥

तस्यै तपो  दमः  कर्मेति  प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि  सत्यमायतनं ॥८॥
           उस (ब्राह्मी उपनिषद्) – की तप, दम, कर्म तथा वेद और सम्पूर्ण वेदाङ्ग — ये  प्रतिष्ठा हैं  एवं सत्य आयतन  है ॥८॥
यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥९॥
           जो निश्चयपूर्वक इस उपनिषद् को इस प्रकार जानता है वह पाप को क्षीण करके अनन्त और महान् स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठित होता है, प्रतिष्ठित होता है ॥९॥
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्च्क्षुः श्रोतमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु  धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः!!!









11 December, 2010

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भीष्म साहनी की कहानी
साग-मीट
        साग-मीट बनाना क्या मुश्किल है। आज शाम खाना यहीं खाकर जाओ, मैं तुम्हारे सामने बनवाऊँगी, सीख भी लेना और खा भी लेना । रुकोगी न? इन्हे साग-मीट खाना बहुत पसन्द है। जब कभी दोस्तों का खाना करते हैं, तो साग-मीट जरूर बनवाते हैं । हाय, साग-मीट तो जग्गा बनाता था,वह होता तो मैं उससे साग-मीट बनवाकर तुम्हे खिलाती । उसके हाथ में बहुत रस था। वह उसमें दही डालता, लहसुन डालता, जाने क्या- क्या डालता। बड़े शौक से बनाता था। मेरे तो तीन-तीन डब्बे घी के महीने में निकल जाते हैं। नौकरों के लिए डालडा रखा हुआ है, पर कौन जाने, मुए हमें डालडा खिलाते हों और खुद अच्छा घी हड़प जाते हों । आज के जमाने में किसी का एतबार नहीं किया जा सकता । मैं ताले तो नहीं लगा सकती । मुझसे ताले नहीं लगते । मैं कहती हूँ, खाते हैं तो खाएँ । कितना खा लेंगे । मुझसे अपनी जान नहीं सम्भाली जाती, अब ताले कौन लगाये ? यह मथरा सात रोटियाँ सवेरे और सात रोटियाँ गिनकर शाम को खाता है । बीच में इसे चाय भी चाहिए, और घर में जो मिठाई हो, वह भी दो । पर मैं कहती हूँ टिका हुआ तो है, आज किसी नौकर का भरोसा थोड़े ही है । किसी भी वक्त उठकर कह देते हैं – मैं जा रहा हूँ ।
        ये भी मुझे यही कहते हैं, कुत्ते के मुँह में हड्डी दिये रहो, तो नहीं भूँकेगा । सत्तर रुपये पर इसे रखा था, अब सौ लेता है । फिर भी इसके तेवर चढ़े रहते हैं । पर जग्गा नेक आदमी था । बड़ा नमक हलाल । वह नौकर थोड़े ही था, वह तो घर का आदमी था । वह इन्हे बहुत मानता था । एक बार ये कुछ कह दें, तो मजाल है, वह पूरा न करे । बड़ा वफादार था । ये भी तो नौकर को नौकर नहीं समझते । घर का आदमी समझते हैं । जब कभी सौ- पचास की जरूरत होती, झट से निकालकर दे देते । कहीं कोई लिखत नहीं, कोई हिसाब नहीं ।
       जग्गा बीवी ब्याह कर लाया, तो दो जोड़े और एक गर्म कोट सिलवाकर दिया । मैं इनसे कहूँ— जी, क्यों पैसे लुटाते हो । नौकर किसी के अपने नहीं होते । इसी को पाँच रुपये कहीं से ज्यादा मिल जाये तो यह पीठ फेर लेगा । ये कहते, तू अपना काम देख, पानी निकालने से कुएँ खाली नहीं होते । यह हमें साग-मीट खिलाता रहे, मुझसे जो माँगेगा, दूँगा । इस जैसा बावर्ची तो शहर भर में नहीं होगा ।
         मुझे वह दिन याद है, जब जग्गे को लेकर आये थे । बाहर से ही आवाज  लगाई, ले सुमित्रा, तेरे लिए नौकर लाया हूँ । जब भी ये तुझसे कहे, इसे चाय के साथ खाने के लिए जरूर दे दिया कर । एक मठरी ज्यादा दे देने से तेरा नुकसान नहीं होगा । इसे घर से मोह पड़ गया, तो वर्षों तक मेरे साथ बना रहेगा । तेरा सारा काम कर दिया करेगा।
        और जग्गा भी ऐसा, जैसे जंगल से हिरन पकड़ लाए हों । बड़ी-बड़ी उसकी आँखें, हिरन की तरह हैरान-सा देखता रहता । वही बात हुई । जग्गे को मोह हो गया । पर यह छोटी उम्र में होता है । बड़े-बड़े मुस्टण्डे नौकर, जो सड़कों पर घूमते रहते हैं, इन्हे क्या मोह होगा । बच्चे कोमल होते हैं, जैसा सिखाओ, सीख जाते हैं । जानवर सीख जाते हैं, तो ये क्यों न सीखेंगे ? इन्हे बस में करने के बड़े ढंग आते हैं ।
       तुम्हे जैकी याद है ना ? हाय, तुम जैकी को भूल गये ? जैकी कुत्ता, जिसे ये एक दोस्त के घर से उठाकर लाये थे, सभी को भूँकता फिरता था । पर इन्होने उसे ऐसा हाथ किया कि इन्ही के कदमों में चक्कर काटता फिरता था । उसे भी ऐसा ही मोह पड़ गया था । इनके साथ, मैं तुम्हे क्या बताऊँ दफ्तर से इनके लौटने का वक्त होता, तो जैकी के कान खड़े हो जाते । बाहर का सारा वक्त दसियों मोटरें दौड़ती रहतीं , पर जिस वक्त इनकी मोटर आती, तो उसे झट से पता चल जाता और भागकर बाहर पहुँच जाता । सीधा गेट पर जा पहुँचता । वहीं एक दिन गाड़ी के नीचे कुचला गया । यह मोह बहुत बुरी चीज है ।
       ये काँटे कहाँ से बनवाये हैं ? बड़े खूबसूरत हैं । हीरे कितने के आये ? सच्चे हैं ना ? आजकल हर चीज को आग लगी हुई है । मैनें यह नाक की लौंग बनवायी, इतना छोटा-सा  हीरा इसमें लगा है, पूरे सात सौ खुल गये । अब तो मुझे पहनते डर लगता है, जब जग्गा था तो मेरी जेवरों की पिटारी भी बाहर पड़ी रहती थी । कभी दो पैसे भी इधर-उधर नहीं हुए । मैं ऐसी भुलक्कड़ हूँ, कभी चेन गुसलखाने में रह जाती है, कभी तिपाई पर रह जाती, जग्ग उठाकर दे देता पर अब तो ऐसे नौकर आये हैं, हरे राम मैनें सारे जेवर उठाकर बैंक में रख दिये हैं । मथुरा से पहले एक नौकर था, मंसा नाम का । ऊपर से बड़ा शरीफ था । लगता, उसके मुँह में जबान ही नहीं है । पर एक दिन मैं पिछवाड़े की तरफ से घर आ रही थी, तो क्या देखती हूँ, मंसा छत पर खड़ा है और गली में खड़े आदमी को ऊपर से एक-एक करके कपड़े फेंक रहा है, ,मुझे देखते ही दोनों चंपत हो गये । मंसा गली में कूद गया और वहीं से भाग गया । आजकल नौकर रखने का जमाना नहीं है । मैं तो घर से बाहर निकल जाऊँ, तो डर लगा रहता है कि पीछे नौकर कहीं घर की सफाई ही न कर जाएँ । जग्गा था तो मुझे भी कोई चिन्ता नहीं होती थी । वह हाथ का बहुत साफ था ।
       तू कुछ खा भी ना । तू तो कुछ भी नहीं खाती । गर्म चाय मँगवाऊँ ? इसे छोड़ दे, यह ठण्डी पड़ गयी होगी, यह केक का टुकड़ा ले । बाजारी है पर बहुत अच्छा है । केक तो बनाती है कमला की सास, एक-से-एक बढ़िया । कभी उनमें चाकलेट डालती है, कभी कुछ, कभी कुछ । ‘वेंगर’ से लेने जाओ, तो जो केक मुए अठारह रुपये में बेचते हैं, कमला की सास पाँच रुपये में बना लेती है। बीच में अण्डे भी, दूध-चीनी भी, किशमिश और बादाम भी, और न जाने क्या-क्या। मुझसे अपनी जान नहीं सँभाली जाती, मैं क्या करूँगी । केक जग्गा भी बहुत अच्छे बनाता था। पर उसकी किस्मत खोटी थी, नहीं तो आज तुम्हे उसी के हाथ का बना केक खिलाती । हर तीसरे-चौथे दिन केक बनाता था, पर खुद कभी नहीं खाता था । मैं उससे कहूँ— तू भी एक टुकड़ा खा ले, पर नहीं । वह कहता, बीवी जी, यहाँ केक खाऊँगा तो बाहर मुझे केक कौन देगा?
          किसे मालूम था कि यों चला जाएगा । मैं तो अब भी कहती हूँ, बक देता तो बच जाता । पर अपनी-अपनी किस्मत है, कोई क्या करे ! इनके सामने उसने मुँह ही नहीं खोला । इन्हे बहुत मानता था । बोला इसलिए नहीं कि इनके दिल को ठेस पहुँचेगी । और क्या बात हो सकती थी ? अब अन्दर की बात इन्हे क्या मालूम ? वह बताएँ भी तो पता चले । वह तो मैं जानती थी । उसके मन में क्या था, उसने हवा तक नहीं लगने दी ।
         धीरे बोल.....दोपहर के वक्त किसी को क्या मालूम, सोया आदमी तो मोये बराबर होता है, हमारे घर में तो उस वक्त चिड़ी नहीं फड़कती । किसी को क्या खबर, घर के पिछवाड़े क्या हो रहा है ? मुझसे अपनी जान नहीं सँभाली जाती । भगवान झूठ न बुलवाये, एक दिन दोपहर को मैं उठी, गुसलखाने की तरफ जा रही थी, जब मुझे खटका-सा हुआ । मुझे लगा, जैसे कोई जग्गा की कोठरी तरफ जा रहा है । मुझे क्या खबर, कौन है, कौन नहीं है । फिर भी मर अन्दर से फुरनी फुरी— इस वक्त यहाँ कौन हो सकता है? जग्गे को तो इस वक्त ये दफ़्तर बुला लेते हैं ।
जग्गा तो इस वक्त दफ्तर में काम करता है, इनके लिए चाय-पाना बनाता है, चपरासीगिरी करता है । ये कहते थे कि घर के लिए कोई दूसरा नौकर मिल जाये तो जग्गे को दफ़्तर में रख लूँगा, फिर इस वक्त यहाँ कौन हो सकता है ?
            मैने खिड़की में से झाँककर देखा । हाय, यह तो विक्की है, मेरा देवर । काला सूट पहने, दबे पाँव चला जा रहा था, सीधे जग्गा की कोठरी के अंदर चला गया । मेरा दिल धक्क से रह गया । हाय मना, यह जग्गे की कोठरी में क्या करने गया है ? फिर मैनें सोचा, किसी काम से आया होगा । पर जग्गे की कोठरी में उसका क्या काम ? और यह इतने दबे पाँव जा रहा है ? मन में आया, इसी से जाकर पूछूँ । पर मुझसे मेरी जान नहीं सँभाली जाती । मैं लौटकर फिर पलंग पर पड़ रही, पर ध्यान मेरा बार-बार उसी तरफ जाये । भलेमानस घरों ऐसे काम नहीं करते । जो ऐसे काम करने हैं, तो शादी क्यों नहीं कर लेता ? किसी का घर क्यों खराब करता है ?
            तुमने जग्गे की घरवाली देखी थी ना ? बड़ी भोली-सी लड़की थी, इतनी गोरी, हाथ लगाये मैली होती थी । यह कलमुँहा किसी बहाने से दफ्तर से भाग आता था और उसकी कोठरी में जा घुसता था । उस दिन मेरी नजर पड़ गयी । असील-सी गाँव की लड़की, सहमी-सहमी-सी इस चंट के आगे क्या बोलती ?
            धीरे बोल.....इनके घर में बदचलनी बहुत है । ये ही एक शरीफ हैं, इनके चाचा ने भी दो-दो रखेल रखी थी, इनकी चाची, बुढ़िया, दोपहर को अपने एक नौकर से पाँव दबवाती थी। मैनें खुद देखा है, खाना खाने के बाद अपने कमरे में घुस जाती और पीछे-पीछे मुस्टण्डा शंकर पहुँच जाता ।
            अब ऐसी बातें छिपा तो नहीं रह सकतीं । एक दिन जग्गे ने ही देख लिया । इन्होने थर्मस मँगवाने के लिए जग्गे को घर भेजा । मैनें उसे थर्मस दी और वह अपनी कोठरी की तरफ चला गया । अचानक मैनें खिड़की से बाहर झाँककर देखा । विक्की, वही काला सूट पहने जग्गे की कोठरी में से बाहर निकल रहा था । ‘विक्की बाबू.....!’ जग्गे ने कहा । फिर उसका मुँह जैसे बन्द हो गया । फटी-फटी आँखों से उसे देखता रह गया । उधर विक्की, बिना उसकी ओर देखे, चुपचाप वहाँ से निकल गया । मेरा दिल धक्-धक् करने लगा । मैनें कहा, अब इसकी घरवाली की खैर नहीं । यह उसे धुन देगा । क्या मालूम, जान से ही मार डाले । इन लोगों का कुछ पता थोड़े ही लगता है, पर कोठरी के अन्दर से न हूँ, न हाँ ।
           मैं नहीं जानती, जग्गा कितनी देर तक अन्दर रहा । उसने अपनी बीवी से कुछ कहा या नहीं कहा । मैं तो जाकर लेट गयी, पर मैनें मन ही मन कहा कि आज मैं इनसे बात करूँगी । या तो जग्गे को चलता करें, या उससे कहें कि अपनी घरवाली को गाँव छोड़ आये । यहाँ इसका रहना ठीक नहीं ।
          लेटे-लेटे भी मेरे कान कोठरी की ओर लगे रहे । अभी वहाँ से चीखने-चिल्लाने, रोने- पीटने की आवाज आएगी । पर वहाँ बिल्कुल चुप ! मैनें मन-ही-मन कहा, ऐसा शरीफ आदमी भी किस काम का जो अपनी घरवाली को काबू में नहीं रख सकता । दो लप्पड़ उसके मुँह पर लगाता, वह अपने आप सीधे रास्ते पर आ जाती । दस तरीके हैं औरत को सीधे रास्ते पर लाने के । पर यहाँ न हूँ, न हाँ ।
          पलंग पर लेटे-लेटे ही मुझे ऐसी घबराहट हुई कि मुझे बाथरूम जाने की हाजत हो आयी । मुझे मुई कब्जी भी तो रहती है ना । रोज रात को ईसबगोल की भूसी दूध में डालकर लेती हूँ, तब जाकर सुबह पेट साफ होता है । कभी-कभी तो जान इतना घबराती है कि क्या बताऊँ । एक बार पूरे पाँच दिन कब्ज रही । ये मजाक करते थे । अब बाथरूम जाओगे तो बाथरूम साफ करना मुश्किल हो जाएगा । हाय, अब तो हँसा भी नहीं जाता । हँसती हूँ तो साँस फूलने लगती है । मुझे बावासीर की शिकायत भी तो रहती है ना । यहाँ एक मुसीबत थोड़े ही है। एक नहीं बीस दवाइयाँ खा चुकी हूँ ।
         डॉक्टर बोलता है, चला-फिरा करो । अब इस शरीर के साथ कौन चल-फिर सकता है? थोड़ा-सा भी चलूँ, तो सांस फूलने लगती है । डॉक्टर कहता है, मिठाई मत खाया करो, पर मुझसे हाथ रोआ ही नहीं जाता । घर में दो-तीन डब्बे मिठाई के हर वक्त मौजूद रहते हैं, पर बर्फी का टुकड़ा मुँह में डालने की देर है कि गुड़-गुड़ होने लगती है । डॉक्टर मुआ बार-बार कहता है, मिठाई खाना छोड़ दो । पर एक टुकड़ा भी मुँह में न डालूँ, तो फिर जंगलों में जा बैठूँ, दुनिया से फिर क्या लेना है ? मैं डॉक्टर से कहती हूँ, मुझे बैठे-बैठे ही ठीक कर दो । न मेरी मिठाई बन्द करो, न मुझे घूमने को कहो । अगर मुझे सैर करके ही दुरुस्त होना है, तो मुझे तुम्हारी क्या जरूरत है ? जब आते हो, पच्चास-पच्चास रुपये ले जाते हो । हम तुम्हे इतने पैसे भी दें, फिर भी तुम ठीक नहीं कर सको, तो फिर फीस किस बात की लेते हो ? हम पांडी-मजूर थोड़े ही हैं कि घूमते फिरें ।
           मैनें डाँटकर कहा, तो डॉक्टर अपने आप सीधा हो गया । कहने लगा, कोई बात नहीं, खाना खाने के बाद दो बड़े चम्मच इस दवाई को पी लिया करो । मैनें कहा, अब आया न सीधे रास्ते पर ! अब दो चम्मच रोज पी लेती हूँ । डकार आनी तो बन्द हो गयी है, पर कोई बात इधर-उधर की हो जाय और मन घबराने लगे, तो बाथरूम की हाजत होने लगती है । उस दिन क्लब में गयी, तो हरचरन की बीवी औरतों पर बड़ा रोआब गाँठ रही थी । कह रही थी मैं सात गोलियाँ रोज खाती हूँ मैंने सुना, पर चुप रही । मैंने कहा, यह भी कोई ऐंठने की बात है ? भगवान अहंकार न बुलवाए, पन्द्रह-पन्द्रह गोलियाँ भी रोज खायीं हैं, पर बाहर जाकर ढिंढोरा नहीं पीटा कि दवाई की पन्द्रह गोलियाँ रोज खाते हैं । डॉक्टर घर का पक्का रखा है, तीन सौ रुपया बँधा-बँधाया उसे हर महीने देते हैं, घर में कोई बीमार हो या न हो, अभी भी खाने वाली मेज पर जा के देखो, कुछ नहीं तो दस दवाई की शीशियाँ वहाँ पर रखी होंगी, कुछ ताकत की गोलियाँ, कुछ हाजमे की, और तरह-तरह की । जग्गे को सब मालूम था कि कौन सी गोली मुझे किस वक्त चाहिए । अपने आप लाकर दे दिया करता था । वह गया, तो दवाइयों का सारा सिलसिला ही खराब हो गया । .......तुम कुछ लो ना, तुम तो कुछ भी नहीं खा रही हो ।
           उस दिन शाम को जब ये घर आए, तो आते ही कहने लगे— कहाँ है जग्गा ? उससे कहो, पाँच आदमी रात को खाना खाने आएँगे, बढ़िया तरकारियाँ बनाए और साग-मीट बनाए । जग्गा आया, तो गुमसुम इनके सामने आकर खड़ा हो गया । चेहरा ऐसा पीला, जैसे मुर्दे का होता है । इन्होने बड़े ला़ड़ से पूँछा— क्यों जग्गे, क्या बात है, इतना चुप क्यों है ? क्या गाँव से कोई बुरी खबर आयी है ? पर जग्गा चुप, न हूँ न हाँ । इन्हे कहता भी तो क्या ? इनसे कैसे कहता कि आपका भाई मेरी घरवाली से मुँह काला कर रहा है । कोई गैरत भी तो होती है । इनके आगे तो वह आँख उठाकर नहीं देखता था । पर इनकी तबीयत को तो तुम जानती हो, बिगड़ जाएँ, तो सख्त बिगड़ते हैं, आगा-पीछा नहीं देखते । और तो और , मुझे भी नौकरों के सामने बेइज्जत कर देते हैं ।
          जब जग्गा कुछ नहीं बोला, तो इन्हे गुस्सा आ गया । जग्गा पत्थर की मूरत बना खड़ा था । जाने उसके मन में क्या था । बोल देता तो अपने दिल का गुबार निकाल लेता । मगर चुप ।
          ये उसे डाँटने लगे, तो मैंने रोक दिया । मैंने कहा, जी मेहमान आने वाले हैं, अभी सारा काम पड़ा है, जा जग्गा, तू रसोई में चल । वह उसी तरह गुमसुम रसोईघर में चला गया । थोड़ी देर बाद मैं रसोईघर में गयी कि खाने-वाने का देखूँ, तो वह वैसे का वैसा खड़ा था । रसोईघर के बीचोबीच पत्थर की मूरत बना हुआ था । मैंने कहा, इसकी बुद्धि पथरा गयी है, यह कोई काम नहीं कर पायेगा । मैं उन्ही कदमों लौट आयी । मैंने इनसे कहा, जी , इसे तो कुछ हो गया है । यह बोलता नहीं, मुझे तो डर लगता है । तुम बाहर से खाना मँगवा लो और इसे आज के दिन छुट्टी दे दो ।
          मैंने कहा तो ये खुद उठकर रसोईघर की तरफ चले गये । और बजाय उसे छुट्टी देने के, उसे फटकारने लगे । मैं थर-थर काँपने लगी । क्या मालूम, जग्गे ने कोई छुरा नेफे में छुपा रखा हो । इन लोगों का क्या भरोसा ? ‘बदजात बोलता क्यों नहीं ?’
ये ऐसे चिल्लाए, जैसा मैंने कभी इन्हे चिल्लाते नहीं सुना । मेरा तो ऊपर का सांस ऊपर और नीचे का नीचे । मैं करूँ तो क्या करूँ ? मैं भागकर इनके पास गई । मैंने सोचा, इन्हे खींचकर बाहर ले आऊँगी, परैन्होने मेरा हाथ झटक दिया । ‘कमीने’ मैं बार-बार पूँछ रहा हूँ, बता क्या बात है, और तू बोलता तक नहीं । तेरी जबान घिसती है, मुझे जवाब देन में ? निकल जा यहाँ से, अभी चला जा, मेरी आँखों से दूर हो जा ।’ और जग्गे को कान से पकड़कर रसोई से बाहर ले आए । मैं इन्हे समझाने लगी, कुछ न कहो जी, घण्टे-दो-घण्टे में मेहमान आने वाले हैं, और अभी तक कुछ नहीं बना । यह चला जाएगा, तो खाना कौन बनाएगा । जा जग्गा, जा, तू रसोईघर में जा । और मैं इन्हे जैसे-तैसे खींच लायी ।
       रात को जब मेहमान चले गये......हाँ जी, बनाया जग्गे ने, सारा खाना बनाया । बड़ा अच्छा खाना बनाया, पर रहा गुमसुम, मुँह से एक लफ़्ज नहीं बोला । खाना खाते-खाते इनका दिल भी पसीज गया । मेहमानों के सामने ही उससे कहने लगे – ‘जग्गे ! जा तेरी दस रुपये तरक्की ! रायसाहब कहते हैं, साग-मीट बहुत अच्छा बना है, शाबाश ! जा तेरा कसूर माफ किया ।’ ये देने पर आयें, तो मुँह माँगी मुराद पूरी करते हैं इनका दिल तो समन्दर है ।
        रातको मुझसे नहीं रहा गया । मैंने कहा, जी, विक्की बड़ा हो गया है, अब इसकी शादी की फिक्र करो । तो कहने लगे— ‘तुम्हे इसकी शादी की क्या पड़ी है, अभी इसकी उम्र ही क्या है, अभी तो इसके मुँह पर से दूध भी नहीं सूखा ।’ मैंने कहा, जी, शादी नहीं करोगे तो खूँटा तुड़ाये साँड़ की तरह जगह-जगह् मुँह मारेगा । मैंने गोल-मोल शब्दों में कहा । पर विक्की से उन्हे बहुत प्यार है, इसे अपने बच्चे की तरह इन्होने पाला है । उसकी बुराई ये नहीं सुन सकते । मैंने फिर से उसकी शादी की बात चलाई, तो कहने लगे— ‘मार ले जितना मुँह मारता है, अभी उसकी उम्र ही क्या है, दो दिन हँस खेल ले, ब्याह के बधन में तो एक दिन बँध ही जाएगा ।’
          मैंने कहा, जी, जवान लड़का है, गलत रास्ते पर भी पड़ सकता है । इसका तो जितना जल्दी हो ब्याह कर दो । इस पर कहने लगे— ‘अभी तो इसने पढ़ाई भी नहीं पूरी की । कुछ नहीं तो तीस-चालीस हजार इसकी पढ़ाई पर खर्च कर चुका हूँ । इसकी शादी करूँ, तो कम-से-कम यह रकम तो वसूल हो । और अभी इसने बी.ए. पास भी नहीं किया ।’
         मर्द लोग बड़े समझदार होते हैं, इन्हे तो दस बातों का ध्यान रहता है । अब मैं और आगे क्या कहती, मैने इतना भर कहा, आप इसके कान खींचते रहा कीजिये, जवानी बड़ी मस्तानी होती है । इस पर ये बिगड़ उठे— ‘तुम्हे कुछ मालूम है क्या ? बोलती क्यों नहीं हो ?’ ये इतनी रुखाई से बोले कि मैं चुप हो गयी । मैने सोचा, फिर कभी मौका मिलेगा, तो बात करूँगी, इन्हे आराम से समझाऊँगी, पर मुझे क्या मालूम था कि दूसरे ही दिन गुल खिलने वाला है ।
         दूसरे दिन सुबह, यही आठ-साढ़े आठ का वक्त होगा, मैं पिछले बरामदे में बैठी बाल सुखा रही थी । वहाँ धूप अच्छी पड़ती है । मैनें सोचा, बाल सूख जाएँ तो उन्हे काला करूँ । जग्गे की घरवाली बड़े सँवारकर मेरे बाल बनाती थी । मैनें सोचा, बाल सूख जाएँ तो उसे बुला लूँगी। यही साढ़े-आठ आठ का वक्त होगा । उसी वक्त फ्रंटियर मेल आती है । घर के पिछवाड़े थोड़ी दूर [अर ही तो रेलवे लाइन है । अगर गाड़ियों को सिगनल नहीं मिले, तो यहीं रुक जाती हैं, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं । पर फ्रंटियर मेल यहाँ नहीं रुकती । वही एक गाड़ी है जो यहाँ नहीं खड़ी होती ।
         जग्गे ने पहले से ही सब कुछ सोच रखा होगा । उधर से गाड़ी आई तो जग्गा अपनी कोठरी में से बाहर निकला । मैंने कहा, जग्गे, सुरस्तां को मेरे पास भेज दे । पर मुझे लगा, जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं । वह भागकर पिछवाड़े की दीवार फाँद गया और रेलवे लाइन की ढलान चढ़ने लगा । यह सब पलक मारते हो गया । उसने मुड़कर पीछे देखा ही नहीं, मेरी भी अक्कल मारी गयी, मुझे सूझा ही नहीं कि वह क्यों भागा जा रहा है । मैंने सोचा, किसी काम से जा रहा होगा । गाड़ी का तो मुझे खयाल ही नहीं आया । वरना मैं उसे रोक नहीं देती ? ढलान चढ़ने के बाद मैंने नहीं देखा कि वह कहाँ गया है, किस तरह गया !
         झूठ क्यों बोलूँ, शाम का वक्त है । बस, फिर मुझे नजर नहीं आया । मुझे तो खटका तब भी नहीं हुआ, जब गाड़ी धम-धम करती आई और कुछ ही देर बाद पहिये घसीटती रुक गई । पहिये घिसटने की आवाज आती है ना, जैसे किसी ने चेन खींची हो। पर मैंने खयाल नहीं किया, यहाँ रोज गाड़ियाँ रुकती हैं । मैंने सोचा, किसी ने चेन खींची होगी । थोड़ी देर में माली भागा-भागा आया । कहने लगा, कोई हादसा हो गया है, और वह भी पिछवाड़े की दीवार फाँदकर ढलान चढ़ने लगा । मुझे फिर भी शक नहीं हुआ । थोड़ी देर बाद पड़ोस वाले नौकरने चिल्लाकर कहा— ‘जग्गा मारा गया है । जग्गा गाड़ी के नीचे कुचला गया है ।’
       मेरा दिल बुरी तरह से धक्-धक् करने लगा । उसके साथ उंस थी ना । वह तो जैसे घर का आदमी था, कोई पराया थोड़े ही था ये तो उसके साथ बेटे जैसा सुलूक करते थे । वह भी इन्हे बाप की तरह मानता था । यही चीज उसे अंदर ही अंदर खा गई । मैं तो अब भी कहती हूँ, अगर जग्गा बोल पड़ता, तो बच जाता । ये जरूर कोई-न-कोई रास्ता ढूंढ निकालते । ये सब तरकीबें जानते हैं । बड़े समझदार हैं । पर वह बोला ही नहीं ।
     वह दिन तो ऐसा बुरा बीता, ऐसा बुरा कि तुम्हे क्या बताऊँ । बार-बार टेलीफोन आए, तीन बार तो पुलिस का इंसपेक्टर आया । बार-बार इन्हे बुलाता, बार–बार कोठरी में झाँककर देखता । अंदर बैठी थी वह कुलच्छणी ! मौका देखने के बहाने इंसपेक्टर बार-बार अंदर जाए । मर्द तो भेड़िए की तरह औरत को घूरते हैं ना । और वह अंदर बेहोश पड़ी थी । उसे बार-बर गश आ रहे थे । अब मैं किस काम की ! मुझसे अपने जान नहीं सँभाली जाती । एक दो बार मन में आया भी कि जाऊँ, सुरस्तां को देख आऊँ । पर इन्होने मना कर दिया  ये कहने लगे, फौजदारी का मामला है, इससे दूर ही रहो । जब तक पुलिस अपनी कार्रवही न कर ले, कोठरी में कदम नहीं रखना । मर्द समझदार होते हैं ना, उन्होने दुनिया दुनिया देखे होती है । पुलिस ने इनसे पूँछा, तो इन्होने कहा, वह पिछले दिन से ही पगलाया-पगलाया लग रह था । मियाँ-बीवे की आपस में कोई बत हुई हो तो हम नहीं जानते । नौकरों की अंदर की बातों से मालिकों का क्या काम ? एक बारा अंदर आए, तो मैनें इनसे कहा, जी, तुम विकी को कहीं बाह्र भेज दो । मैं कहूँ, इन्हे मालूम नहीं, पर आसपास के किसी आदमी को मालूम हुआ तो बखेड़ा खड़ा हो जाएगा । पर इन्होने समझदारी की । विक्की को बाहर नहीं भेजा । मर्द लोग समझदार होते हैं, विक्की लापता हो जाता, तो पुलिस को शक पड़ सकता था, ना ।
          एक मठरी और लो ! लो ना ! तुमने तो कुछ खाया ही नहीं । खाओगी तो सेहत बनी रहेगी, बस मुटियाना नहीं । मेरी तरह मोटी नहीं होना, मोटी देह किस काम की । तुम आ गई, तो घण्टा-आध-घण्टा मन बहल गया । कभी-कभी आ जाया करो ना। तुम दूर तो नहीं रहती हो । कहो तो मोटर भेज दिया करूँ ? अकेले में तो घर भाँय-भाँय करता है । ये तो दफ्तर से आते हैं तो सीधे ब्रिज खेलने चले जाते हैं । जब तक तीन-चार घण्टे ब्रिज न खेल लें, इन्हे चैन नहीं मिलता । यह ताश तो मेरी ऐसी शौकन आई है, इस घर में जब से ब्याही आई हूँ, यह मेरा पीछा नहीं छोड़ती । रोज शाम को इन्हे उड़ा ले जाती है । हाय, अब तो हँस भी नहीं सकती । हँसती हूँ, तो साँस फूलने लगता है । छाती में शाँ-शाँ होती है । मैं इनसे कहूँ, तुम ताश बहुत ना खेला करो जी । अपनी सेहत का भी कुछ खयाल किया करो । जानती हो, क्या कहते है ? कहने लगे, इसी ताश के ही तुफैल ही तो मेरे दस काम सँवरते हैं । पुलिस का बड़ा अफसर ताश का साथी था, तभी जग्गे वाला मामला रफा-दफा हो गया, वरना घर में से कोई खुदकुशी करे, तो पुलिस वाले क्या घरवाले को नहीं परेशान करेंगे ? मैंने कहा, ठीक है, मर्द लोग जानें, हम क्या जानें । बस वही दिन हमारा बुरा गुजरा । इनको दिन के वक्त सोने की आदत है, थोड़ा सो न लें, तो बदन भारी-भारी महसूस करने लगता है, पर कोई सोने दे तो ! उस दिन वह भी नहीं हुआ । सोने के लिए लेटे, तो कभी टेलीफोन की घण्टी बजने लगे, कभी कोई सरकारी आदमी आ जाए । पर दूसरे दिन से चैन हो गया । फिर कोई नहीं आया ।
          जब मामला रफा-दफा हो गया, एक दिन मैनें विक्की की सारी करतूत इन्हे बता दी । ये कहने लगे— मुझे तो पहले दिन से मालूम था । मैं हक्की-बक्की इनके मुँह की ओर देखने लगी । जवानी में सभी बेवकूफियाँ करते हैं, इसने कर ली तो क्या हुआ । मैनें कहा— जी, विक्की को समझा तो दिया होता । कहने लगे, कोई बेसवा के पास तो नहीं गया, कोई बीमारी तो नहीं ले आया, हो गयी बात जो होनी थी, आगे के लिए इसे खुद कान हो जाएँगे । मैनें कहा, जी, पर बात तो अच्छी नहीं ना, ऐसा विक्की को करना तो नहीं चाहिए था ना । विक्की ने ऐसा नहीं किया होत तो जग्गा जान पर तो नहीं खेल जाता ना । तो कहने लगे, तुम क्या चाहती हो, भाई को पुलिस में दे देता ? पर जी, उसने तो जुर्म बहुत बड़ा किया है ना । ये और भी बिगड़ उठे । उसका जुर्म देखता या उसकी जान बचाता ? तुम क्या चाहती हो, उसे काल कोठरी में भिजवा देता ?
         फिर थोड़ी देर बाद धीमे से बोले । मुझे समझाने लगे, अव्वल तो कौन जाने विक्की अपने-आप अंदर गया था, या जग्गे की घरवाली उसे इशारे करती रहती थी । ताली एक हाथ से तो नहीं बजती । औरत बढ़ावा देती है, तभी मर्द बहकता है । लड़की इशारा भी कर दे तो आदमी बौरा जाता है, कोठरी के बाहर पर्दा लगा रहता है । क्या मालूम पर्दे की ओट में उसे इशारे करती रही हो । औरत खुद न चाहती, तो क्या मजाल था कि विक्की उसके कमरे में जाता । ऐसे ही कोई किसी के कमरे में घुस जाता है ? इतनी ही शरीफजादी थी तो अंदर से कमरा बंद करके क्यों नहीं बैठती थी ? अंदर से साँकल लगाकर बैठती । तेरा मर्द बाहर काम पर गया है, तू कोठरी में अकेली है, तू अंदर से कोठर बंद करके बैठ । दरवाजा खोलकर बैठने का तेरा क्या मतलब है ? दिन के वक्त तेरे पास आ सकती थी । उसे किसी ने मना किया था ?
            मैं सुनती रही, मैं भी सोचूँ, किसी के दिल की कौन जानता है, लड़की के दिल में चोर था, या विक्की के दिल में, भगवान् जाने ।
          आखिर में जी, इन्होने सारा मामला सँभाल लिया, इनसे सब संतुष्ट हो गये । इन्हे भगवान ने ऐसी समझदारी दी है, इनकी कोई कसम तक नहीं खाता । सभी इनके सामने हाथ जोड़ते हैं । ये जल्दी घबरा नहीं जाते ना, यही इनकी सबसे बड़ी खूबी है । कोई दूसरा होता तो घबरा जाता । जग्गे का भाई गाँव से आया, बहुत रोया-धोया, उसे इन्होने दो सौ रुपये निकाल कर दे दिए । जग्गे की घरवाली का बाप आया । उसे भी इन्होने पैसे दिए । मैनें इनसे कहा, जी, मामला रफा-दफा हो गया है, अब ये हमारे क्या लगते हैं, तुम पैसे लुटा रहे हो । पर नहीं, ये कहने लगे, जग्गे ने दस साल हमारी सेवा की है । इसे हम कैसे भूल सकते हैं । कहने लगे, सौ-पचास दे दो, तो गरीब का मुँह बंद हो जाता है । ये सबका भला सोचते हैं, किसी का बुरा नहीं सोचते । हर किसी की मदद ही करेंगे ।




  यह जरा घण्टी तो बजाना । मुए जानते भी हैं, रात पड़ गयी है, मगर मजाल है जो अपने-आप बत्ती जलाएँ । बार-बार घण्टी बजानी पड़ती है । कानों में तेल डाले पड़े रहते हैं। अब आई हो तो खाना खाकर जाना । ये जाने कब लौटेंगे । कभी दस बजे आते हैं, कभी खाना खाकर आते हैं । मैं दिनभर बैठे कौए उड़ाती रहती हूँ अब खाना खाये बि   
ना तो मैं तुम्हे जाने नहीं दूँगी । तुम आ गई, तो घड़ी भर दिल बहल गया । हमने अपनी बातें तो अभी तक की ही नहीं, दोनों बैठी बातें करेंगी । तुमने साग-मीट का पूँछा तो मुए जग्गे की बात चल पड़ी । मैं तुम्हे खाना खाये बिना नहीं जाने दूँगी..............