Search This Blog

02 December, 2010

Harishankara Parasaai's Essay

मनुष्य का गोश्त बच्चे भी क्यों न चखें
हरिशंकर परसाई
       जो शासक जितना अधिक भ्रष्टाचारी हो, उसे प्रजा को सदाचारी बनाने का उसी अनुपात में प्रयत्न करना चाहिए। यह निर्देश चाणक्य का नहीं है  पर हमारे जमाने में अगर चाणक्य का अवतार होता, तो दूसरा चाणक्य यही नीति-निर्देश शासकों को देता। वर्तमान शासक यही नीति अपना रहे हैं। बिहार के मुख्यमन्त्री जगन्नाथ मिश्र हैं। कोई भी हिन्दी या अंग्रेजी का साप्ताहिक पत्र उठाता हूँ, तो उसमें ४-५ पृष्ठ जगन्नाथ मिश्र की भ्रष्टाचार-कथा के होते हैं। दैनिक अखबारों में तो रोज ही यह पुण्यकथा टुकड़े-टुकड़े में आती है। रामायण में तो ७ काण्ड हैं, मुख्यमन्त्रियों के सौ-सौ काण्डों के महकाव्य बन चुके हैं। मैं अब साप्ताहिक पत्र खोलते डरता हूँ। पत्र के कवर पर अगर जगन्नाथ मिश्र का चित्र हो, तो इस डर से कि भीतर ‘स्टोरी’ होगी, मैं उस पत्र को पढ़ता ही नहीं। इनका यशोगान पढ़ते-पढ़ते लोग तंग आ चुके हैं।
       मगर मिश्रजी की आध्यात्मिक उदात्त भावना को देखिये कि वे बिहार के युवक छात्रों को सदाचारी बनाना चाहते हैं। यह सारे देश में विश्वविद्यालयों में परीक्षा का मौसम है। बिहार में ‘लार्ज स्केल’ (बड़े पैमाने) पर परीक्षाओं में नकल हो रही है। दूसरे भ्रष्ट साधन अपनाये जा रहे हैं, जैसे पेपर आउट करना। जगन्नाथ ने नकल तथा भ्रष्ट तरीके रोकने के लिए कठोर कार्यवाही करने के आदेश दिये हैं। महाराष्ट में पहले अध्यादेश था, जो अब कानून बन गया है। इसके मुताबित नकल करने वाले छात्र को जेल की सजा और जुर्माना होगा। पेपर आउट करने-कराने पर भी जेल होगी। पेपर आउट कराने के लिए पिता या अभिभावक, जो भी पैसे देगा,उसे भी सजा होगी।
       यह मौसम परीक्षा का ऐसा है कि अध्यापकगण खतरे में रहते हैं।अध्यापक उदास है और भयभीत स्वर में कहता है— कल से ‘इनविजिलेशन’ की ड्यूटी लग गयी है। यानि अदालत में फाँसी की सजा हो गयी है, बस टँगने की देर है। नकल पकड़ने गये, तो सिर फूटता है या छुरा घुसता है, कुछ ठिकाना नहीं। विश्वविद्यालय अध्यापकों के उड़नदस्ते परीक्षा-केन्द्रों पर भेजते हैं, तो उन पर पत्थर बरसते हैं। मेरी जानकारी में एक महाविद्यालय में तो उड़नदस्ते पर पत्थर फ़ेंकने का नेतृत्व खुद प्रिंसिपल कर रहे थे। वहाँ सामूहिक नकल हो रही थी। एक लॉ कॉलेज में सामूहिक नकल की परम्परा ही पड़ गयी थी। वहाँ की कापियाँ जाँचने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के अश्यापक के पास गयीं, तो बेचारे ने वो कापियाँ वापस कर दीं, इस नोट के साथ कि मुझमें इन कापियों को जाँचने की योग्यता नहीं है। ये छात्र नहीं हैं वरन् कानून की ‘अथॉरिटी’ (अधिकारी विशेषज्ञ) हैं।
      इनके बराबर ज्ञान तो मुझमें भी नहीं है। दादा लोग हैं। छुरा खुला हुआ डेस्क पर रखकर किताब से नकल करते हैं। एक-दो को जानता हूँ, जिन्होने डेस्क पर छुरा रख-रखकर एम.ए. और एल-एल.बी. कर लिया और छुरा दिखा-दिखाकर प्रोफ़ेसर से थीसिस लिखवाकर पी-एच.डी. भी कर ली। दादा लोग अध्यापकों की ड्यूटी लगा देते हैं।परीक्षा-केन्द्र के पास मकान में हा जरूरी विषय के अध्यापक पुस्तकें लिये बैठे रहते हैं। पेपर आता है और वे एक-एक प्रश्न के उत्तर साइक्लोस्टाइल कराके परीक्षा-भवन में भेजते जाते हैं एक कॉलेज की प्रबन्ध समिति का सदस्य था। परीक्षा के वक्त यों ही पहुँचा, तो धूप में २५-३० युवक खड़े हैं, जो भीतर अपने-अपने चेलों को प्रश्नों के उत्तर भेज रहे हैं। मैनें प्रिंसिपल से कहा— जब इस नैतिकता को स्वीकार ही कर लिया गया है, तो इन लोगों को तकलीफ क्यों हो, इनके लिए शामियाना लगवा दो और ठण्डे पानी के घड़े रखवा दो।
      और भी उज्ज्वल बात यह है कि कुछ अध्यापक खुद नकल करवाते हैं। ज्यों ही जासूस ने खबर दी कि उड़नदस्ता आ रहा है, सारी किताबें बाथरूम में छिपा दीं। खतरा टल गया, तो फिर किताबें निकाल लीं।
      उन्नीस-बीस नहीं, तो पन्द्रह-बीस का फ़र्क पड़ सकता है। पर होंगे वही मूल्य। शिक्षण-केन्द्रों में कम भ्रष्टाचार नहीं है। गुरुकुलों, ऋषि-मुनियों, शिक्षा की पवित्रता, आदर्श आदि की बात करना पाखण्ड है। जो यथार्थ है, वह यह कि शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ने और पढ़ाने वाले आमतौर पर भ्रष्ट हैं। अपवाद जरूर है, अनुपात भी कम है। पर वस्तुस्थिति यही है, इसे लोग जानते हैं।
      पर भ्रष्ट शासक, भ्रष्ट समाजनेता, भ्रष्ट उपदेशक, भ्रष्ट तथाकथित देश-सेवक छात्रों को सदाचारी बनाना चाहते हैं, तो अच्छी बात है। महान चीनी लेखक लूशुन की बहुत मशहूर कहानी है— ‘एक पागल की डायरी।’ इसमें अन्त में वह ‘पागल’ लिखता है— ‘हम चार हजार सालों से मनुष्य का गोश्त ख़ा रहे हैं। बच्चों ने इसे नहीं चखा है। इन बच्चों को बचाओ।’
     हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति वाली जाति भी पाँच हजार सालों से मनुष्य का मांस खा रही हैं, सिर्फ़ मनु महराज के नियम को देख लीजिए— जैसे शूद्र यदि द्विज का नाम भी घृणा से ले ले, तो उसके मुँह में लोहे की गरम छड़ ठूँस दी जाय। यदि शूद्र; राजा या ब्राह्मण को उसका कर्तव्य बताने की धृष्टता करे, तो उसके मुँह और कान में गरम तेल डाल दिया जाय, मगर यदि ब्राह्मण शूद्र को मार डाले, तो उसे उतना ही प्रायश्चित्त करना पर्याप्त होगा, जितना सुअर और कुत्ते को मारने के लिए।
      हैं न हम लोग मनुष्यभक्षी सदियों से? और हम मनुष्य खानेवालों ने असम के छात्रों को, जिन्होने नरमांस का स्वाद नहीं लिया था, नरमांस खाना सिखा दिया है। अच्छा है कि दूसरी जगह के छात्रों को हम नरभक्षी बनाने से बचाना चाहते हैं।
        इन कड़े कानूनों से नकल रुकेगी, यह कुछ निश्चित नहीं। कौन नकल पकड़ेगा? कौन झंझट लेगा? कौन खतरा उठायेगा। पुलिस क्या एक बला और मोल लेगी? जिन पर १०-१० गिरफ़्तारी के वारण्ट हैं, ऐसे छात्र-नेता तो पुलिस के साथ दारू पीते हैं। नेता को गिरफ़्तार करके छात्र-हुल्लड़ की मुसीबत पुलिस क्यों बुलाये? डर से डरपोक लड़के नकल न करें, इतना हो सकता है।
       साधारण गरीब और निम्न-मध्यवर्ग के लड़के पढ़ना चाहते हैं, ईमानदारी से परीक्षा भी देना चाहते हैं। वे जल्दी डिग्री लेकर नौकरी करना चाहते हैं, जिससे परिवार की गर्दिश कम कर सकें।
       माँ-बाप अपना पेट काटकर उनके लिए फीस और पुस्तकों का इन्तजाम करते हैं। छोटे भाई-बहन फटे कपड़े पहनते हैं— बड़े भैया की पढ़ाई और नौकरी के लिए। ऐसे लड़के सौ में नब्बे होते हैं। मगर इनके दुश्मन होते हैं, बिना उद्देश्य,बिना ध्येय के हुल्लड़बाज छात्र-नेता, जो दस-पन्द्रह साल विश्वविद्यालयों और कॉलेज में आतंक पैदा कर हरामखोरी कर जिन्दा रहते हैं। ये सम्पन्न घरों के या सामन्ती अपराधी पारिवारिक संस्कार के, या जीवन में अपराध को ही धन्धा बनाने वाले होते हैं नकल यही करते और करवाते हैं।
       इनकी दुर्गति भी होती है क्षणिक, जब किसी कठोर पुलिस वाले से पाला पड़ जाता है। इधर एक विश्वविद्यालय के २-३ कॉलेजों में पुलिस की निगरानी में परीक्षा होती है। पुलिस थानेदार इन रंगदारों से कह देता है— सालो, खिड़की से बाहर झाँका कि कनपटी फट जायेगी। परीक्षा हॉल से किसी बहाने ऊधम करके बाहर निकले तो इतने डण्डे पड़ेंगे कि दोनों टाँगें टूट जायँगी। तो परीक्षा शान्ति से हो जाती है। बस पेपर निकालने का काम कन्स्टेबलों को और जाँचने का काम हवलदारों को दे दिया जाय, तो शिक्षा-व्यवस्था ठीक हो जायगी।
       आम अच्छे लड़के भी नकल क्यों करते हैं? एक इस कारण कि बहुत अध्यापक पढ़ाते नहीं हैं। क्लास हे नहीं लेते। इन अध्यापकों के लिए भी दण्ड की व्यवस्था की जाय। फिर भला लड़का भी सोचता है कि दूसरे कई नकल कर हैं, उनका ऊँचा स्थान हो जायेगा और क्लास नहीं पाऊँगा। तीसरा कारण है नकल सर्वव्यापी वातावरण। उसे बुरा नहीं माना जाना।
       मूल है— बेकारी की समस्या! सारी बुराइयों की जड़ है बेकारी की सम्भावना। अगर शिक्षा की निश्चित योजना और उद्देश्य हो, अगर डिग्री मिलते ही युवक को नौकरी मिलना तय हो, तो लड़के मन लगाकर पढ़ेंगे और ईमानदारी से परीक्षा देंगे। अभी बहाने बनाकर परीक्षायें टलवाते हैं। पास होने पर नौकरी पक्की हो तो वे हाथ जोड़कर कहेंगे—सर, दो महीने पहले ही परीक्षा ले लीजिये, ताकि हम जल्दी नौकरी पर चलें। बिना बेकारी खत्म किये ये कोई समस्याएँ हल नहीं होंगी।
       सरकारों ने छात्रों के लिए तो दण्ड विधान कर दिया। मगर गुरुओं के लिए? किसी चाणक्य या मनु से गुरु के लिए भी दण्ड-विधान बनवा लेते। जो मोटा वेतन लेते हैं, पर पढ़ाते नहीं। जो पक्षपात करते हैं, जो धनियों से पैसा लेकर पहला दर्ज़ा देते हैं, जो गुरुपत्नी के लिए सोने की चेन लेकर डॉक्टरेट देते हैं, जो गरीब आदिवासी छात्रों को ८-८ महीने स्कॉलरशिप नहीं लेने देकर भूखा मारते हैं जो शोधछात्रों की फेलोशिप आधी खुद खा जाते हैं, जो  द्वेष के मारे मेधावी तरुणों की जिन्दगी बरबाद करते हैं। इनकी भी नाक-कान काटने, आँख फोड़ने जीभ काटने का दण्ड-विधान होना चाहिए। बहरहाल, हम तो पाँच हजार सालों से मनुष्य का मांस खा रहे हैं। जिन्होने उसे नहीं चखा है, उन्हे बचाने की कोशिश करें। मेरा एक ही प्रश्न है— जब सत्ताधारी और नेता तथा बड़े लोग जानते हैं, मानते हैं और जिनके पास जीवन से प्रमाणित यह सत्य है कि दुराचरण से ही सुख सफलता और सम्पत्ति मिलते हैं तो सदाचार सिखाकर इन छात्रों की जिन्दगी क्यों बरबाद करने पर तुले हैं?









21 November, 2010

Raghuvansha Mahakavyam 5th Chapter





   तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं नि:शेषविश्राणितकोषजातं । उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी कौत्स: प्रपेदे वरतन्तुशिष्य: ॥१॥ स मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात्पात्रे निधायार्घ्यमनर्घशील: । श्रुतप्रकाशं यशसा प्रकाश: प्रत्युज्जगामातिथिमातिथेय: ॥२॥ तमर्चयित्वा विधिवद्विधिज्ञस्तपोधनं मानधनाग्रयायी । विशाम्पतिर्विष्टरभाजमारात्कृताञ्जलि: कृत्यविदित्युवाच ॥३॥ अप्यग्रणीर्मन्त्रकॄतामृषीणां कुशाग्रबुद्धे! कुशली गुरुस्ते । यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्तं लोकेन चैतन्यमिवोश्णरश्मे: ॥४॥  कायेन वाचा मनसाऽपि  शश्वद्यत्सम्भृतं वासवधैर्यलोपि  । आपाद्यते न  व्ययमन्तरायै:         कच्चिन्महर्षेस्त्रिविधं तपस्तत् ॥५॥ आधारबन्धप्रमुखै:  प्रयत्नै:     संवर्धितानां   सुतनिर्विशेषम्  । कच्चिन्न  वाय्वादिरुपप्लवो व:        श्रमच्छिदामाश्रमपादपानाम्॥६॥       क्रियानिमित्तेष्वपि वत्सलत्वादभग्नकामा  मुनिभि: कुशेषु  ।  तदङ्कशय्याच्युतनाभिनाला   कच्चिन्मृगीणामनघा प्रसूति:  ॥७॥ निर्वर्त्यते यैर्नियमाभिषेको येभ्यो निवापाञ्जलय: पितृणाम् । तान्युञ्छषष्ठाङ्कितसैकतानि शिवानि वस्तीर्थजलानि कच्चित् ॥८॥ नीवारपाकादि  कडङ्गरीयैरामॄश्यते  जानपदैर्न  कच्चित्  ।  कालोपपन्नातिथिकल्प्यभागं  वन्यं शरीरस्थितिसाधनं व: ॥९॥ अपि प्रसन्नेन  महर्षिणा  त्वं  सम्यग्विनीयानुमतो गृहाय । कालो ह्ययं  सङ्क्रमितुं द्वितीयं  सर्वोपकारक्षममाश्रमं ते ॥१०॥ तवार्हतो नाभिगमेन तृप्तं मनो नियोगक्रिययोत्सुकं मे । अप्याज्ञया शासितुरात्मना वा प्राप्तोऽसि सम्भावयितुं वनान्माम् ॥११॥ इत्यर्घपात्रानुमितव्ययस्य   रघोरुदारामपि  गां  निशम्य । स्वार्थोपपत्तिं  प्रति  दुर्बलाशस्तमित्यवोचद्वरतन्तुशिष्य:    ॥१२॥ सर्वत्र नो वार्तमवेहि राजन्नाथे  कुतस्त्वय्यशुभं प्रजानाम् । सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्टे:  कल्पेत लोकस्य कथं तमिस्ना ॥१३॥ भक्ति: प्रतीक्ष्येषु कुलोचिता ते पूर्वान्महाभाग ! तयाऽतिशेषे । व्यतीतकालस्त्वहमभ्युपेतस्त्वामर्थिभावादिति मे  विषाद: ॥१४॥  शरीरमात्रेण नरेन्द्र !  तिष्ठन्नाभासि  तीर्थप्रतिपादितर्द्धि: । आरण्यकोपात्तफलप्रसूति:    स्तम्बेन  नीवार   इवावशिष्ट:         ॥१५॥ स्थाने भवानेकनराधिप:   सन्नकिञ्चनत्वं मखजं व्यनक्ति । पर्यायपीतस्य  सुरैर्हिमांशो:  कलाक्षय:  श्लाघ्यतरो  हि वॄद्धे:   ॥१६॥ तदन्यतस्तावदनन्यकार्यो गुर्वर्थमाहर्तुमहं  यतिष्ये  । स्वस्त्यस्तु  ते निर्गलिताम्बुगर्भं शरत् घनं नार्दति चातकोऽपि ॥१७॥ एतावदुक्त्वा प्रतियातुकामं  शिष्यं  महर्षेर्नॄपतिर्निषिध्य  । किं वस्तु विद्वन्! गुरवे प्रदेयं त्वया कियद्वेति तमन्वयुङ्क्त: ॥१८॥ ततो यथावद्विहिताध्वराय  तस्मै  स्मयावेशविवर्जिताय  । वर्णाश्रमाणां  गुरवे स वर्णी  विचक्षण:     प्रस्तुतमाचचक्षे  ॥१९॥ समाप्तविद्येन   मया   महर्षिर्विज्ञापितोऽभूद्गुरुदक्षिणायै   । स मे चिरायास्खलितोपचारां तां भक्तिमेवागणयत्पुरस्तात् ॥२०॥ निर्बन्धसञ्जातरुषाऽर्थकार्श्यमचिन्तयित्वा  गुरुणाऽहमुक्त:   । वित्तस्यविद्यापरिसङ्ख्यया मे  कोटिश्चतस्रो दश चाहरेति ॥२१॥ सोऽहं  सपर्याविधिभाजनेन मत्वा भवन्तं  प्रभुशब्दशेषम् । अभ्युत्सहे सम्प्रति  नोपरोद्धुमल्पेतरत्वाच्छ्रुतनिष्क्रयस्य ॥२२॥ इत्थं द्विजेन  द्विजराजकान्तिरावेदितो  वेदविदां  वरेण  । एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिरेनं   जगाद  भूयो  जगदेकनाथ:     ॥२३॥ गुर्वर्थमर्थी   श्रुतपारदृश्वा रघो:   सकाशादनवाप्य कामम्  । गतो  वदान्यान्तरमित्ययं  मे मा  भूत्परीवादनवावतार: ॥२४॥ स त्वं प्रशस्ते महिते मदीये वसंश्चतुर्थोऽग्निरिवाग्न्यगारे । द्वित्राण्यहान्यर्हसि  सोढुमर्हन् यावद्यते साधयितुं त्वदर्थम् ॥२५॥ तथेति तस्यावितथं प्रतीत:   प्रत्यग्रहीत्सङ्गरमग्रजन्मा  ।  गामात्तसारां  रघुरप्यवेक्ष्य  निष्क्रष्टुमर्थं चकमे  कुबेरात् ॥२६॥  वसिष्ठमन्त्रोक्षणजात्प्रभावादुदन्वदाकाशमहीधरेषु      ।  मरुत्सखस्येव बलाहकस्य गतिर्विजघ्ने न हि तद्रथस्य ॥२७॥ अथाधिशिश्ये प्रयत: प्रदोषे रथं रघु:   कल्पितशस्त्रगर्भम्  । सामन्तसम्भावनयैव  धीर:  कैलासनाथं  तरसा  जिगीषु: ॥२८॥ प्रात: प्रयाणाभिमुखाय तस्मै सविस्मया: कोषगृहे नियुक्ता: । हिरण्यमयीं कोषगृहस्य मध्ये वृष्टिं शशंसु: पतितां नभस्त: ॥२९॥ तं भूपतिर्भासुरहेमराशिं   लब्धं  कुबेरादभियास्यमानात् ।  दिदेश कौत्साय समस्तमेव पादं सुमेरोरिव वज्रभिन्नम् ॥३०॥ जनस्य  साकेतनिवासिनस्तौ  द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्त्वौ  । गुरुप्रदेयाधिकनि:स्पृहोऽर्थी  नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥३१॥ अथोष्ट्रवामीशतवाहितार्थं  प्रजेश्वरं  प्रीतमना  महर्षि:  ।  स्पृन्करेणानतपूर्वकायं  सम्प्रस्थितो  वाचमुवाच  कौत्स:     ॥३२॥ किमत्र चित्रं यदि कामसूर्भूवृत्ते स्थितस्याधिपते: प्रजानाम् । अचिन्तनीयस्तु तव प्रभावो मनीषितं द्यौरपि येन दुग्धा ॥३३॥ आशास्यमन्यत्पुनरुक्तभूतं  श्रेयांसि  सर्वाण्यधिजग्मुषस्ते  ।  पुत्रं  लभस्वात्मगुणानुरूपं  भवन्तमीड्यं भवत: पितेव ॥३४॥ इत्थं प्रयुज्याशिषमग्रजन्मा राज्ञे प्रतीयाय गुरो: सकाशम् । राजाऽपि लेभे सुतमाशु तस्मादालोक मर्कादिव जीवलोक: ॥३५॥ ब्राह्मो मुहूर्तो किल तस्य देवी कुमारकल्पं सुषुवे कुमारम् । अत: पिता ब्राह्मण एव नाम्ना तमात्मजन्मानमजं चकार ॥३६॥ रूपं तदोजस्वि तदेव वीर्यं तदेव  नैसर्गिकमुन्नतत्वम् । न कारणात्स्वाद्विभिदे कुमार:  प्रवर्तितो दीप इव प्रदीपात् ॥३७॥ उपात्तविद्यं विधिवद्गुरुभ्यस्तं यौवनोद्भेदविशेषकान्तम् ।  श्री:   साभिलाषाऽपि गुरोरनुज्ञां धीरेव कन्या पितुराचकाङ्क्ष ॥३८॥       अथेश्वरेण  क्रथकैशिकानां  स्वयंवरार्थं स्वसुरिन्दुमत्या:  ।  आप्त:      कुमारानयनोत्सुकेन  भोजेन दूतो रघवे विसृष्ट: ॥३९॥ तं श्लाघ्यसम्बन्धमसौ विचिन्त्य दारक्रियायोग्यदशं च पुत्रम्। प्रस्थापयामास ससैन्यमेनमृद्धां विदर्भाधिपराजधानीम् ॥४०॥ तस्योपकार्यारचितोपचारा  वन्येतरा  जानपदोपदाभि: ।  मार्गे   निवासा    मनुजेन्द्रसूनोर्बभूवुरुद्यानविहारकल्पा: ॥४१॥ स नर्मदारोधसि  सीकरार्द्रैर्मरुद्भिरानर्तितनक्तमाले  । निवेशयामास विलङ्घिताध्वा क्लान्तं रजोधूसरकेतु सैन्यम् ॥४२॥ अथोपरिष्टाद्भ्रमरैर्भ्रमद्भि:    प्राक्सूचितान्त:सलिलप्रवेश:   ।  निर्धौतदानामलगण्डभित्तिर्वन्य:   सरित्तो गज उन्ममज्ज ॥४३॥ नि:शेषविक्षालितधातुनाऽपि   वप्रक्रियामृक्षवतस्तटेषु  ।   नीलोर्ध्वरेखाशबलेन  शंसन्दन्तद्वयेनाश्मविकुणठितेन ॥४४॥ संहारविक्षेपलघुक्रियेण  हस्तेन तीराभिमुख:  सशब्दम्  । बभौ स भिन्दन्बृहतस्तरङ्गान्वार्यर्गलाभङ्ग इव प्रमत्त: ॥४५॥  शैलोपम:   शैवलमञ्जरीणां जालानि कर्षन्नुरसा स पश्चात् । पूर्वं  तदुत्पीडितवारिराशि:  सरित्प्रवाहस्तटमुत्ससर्प ॥४६॥ तस्यैकनागस्य  कपोलभित्त्योर्जलावगाहक्षणमात्रशान्ता  । वन्येतरानेकपदर्शनेन   पुनर्दिदीपे   मददुर्दिनश्री:        ॥४७॥  सप्तच्छदक्षीरकटुप्रवाहमसह्यमाघ्राय  मदं  तदीयम्  । विलङ्घिताधोरणतीव्रयत्ना:    सेनागजेन्द्रा  विमुखा  बभूवु:  ॥४८॥ स  च्छिन्नबन्धद्रुतयुग्यशून्यं   भग्नाक्षपर्यस्तरथं  क्षणेन । रामापरित्राणविहस्तयोधं सेनानिवेशं तुमुलं चकार ॥४९॥ तमापतन्तं नृपतेरवध्यो वन्य: करीति श्रुतवान्कुमार: । निवर्तयिष्यन्विशिखेन कुम्भे जघान नात्यायतकष्टशार्ङ्ग: ॥५०॥ स विद्धमात्र:  किल नागरूपमुत्सृज्य तद्विस्मितसैन्यदृष्ट: ।  स्फुरत्प्रभामण्डलमध्यवर्ति कान्तं वपुर्व्योमचरं प्रपेदे ॥५१॥  अथ प्रभावोपनतै:  कुमारं कल्पद्रुमोत्थैरवकीर्य पुष्पै:   । उवाच  वाग्मी  दशनप्रभाभि:   संवर्धितोर:स्थलतारहार:      ॥५२॥  मतङ्गशापादवलेपमूलादवाप्तवानस्मि मतङ्गजत्वम्     ।  अवेहि   गन्धर्वपतेस्तनूजं  प्रियंवदं  मां   प्रियदर्शनस्य ॥५३॥ स  चानुनीत:  प्रणतेन  पश्चान्मया  महर्षिर्मृदुतामगच्छत्  । उष्णत्वमग्न्यातपसम्प्रयोगाच्छैत्यं हि यत्सा प्रकृतिर्जलस्य ॥५४॥ इक्ष्वाकुवंशप्रभवो यदा  ते  भेत्स्यत्यज: कुम्भमयोमुखेन  ।  संयोक्ष्यसे स्वेन वपुर्महिम्ना तदेत्यवोचत्स तपोनिधिर्माम् ॥५५॥ स्म्मोचित:    सत्त्ववता त्वयाऽहं  शापाच्चिरप्रार्थितदर्शनेन  । प्रतिप्रियं चेद्भवतो न कुर्यां वॄथा हि मे स्यात्स्वपदोपलब्धि: ॥५६॥ सम्मोहनं नाम सखे !  ममास्त्रं  प्रयोगसंहारविभक्तमन्त्रम्  । गान्धर्वमादत्स्व  यत:  प्रयोक्तुर्न चारिहिंसा  विजयश्च हस्ते ॥५७॥ अलं ह्रिया मां प्रति यन्मुहूर्तं दयापरोऽभू: प्रहरन्नपि त्वम् । तस्मादुपच्छन्दयति प्रयोज्यं मयि त्वया न प्रतिषेधरौक्ष्यम् ॥५८॥ तथेत्युपस्पृश्य पय:   पवित्रं  सोमोद्भाया:  सरितो  नृसोम:    । उदङ्मुख:   सोऽस्त्रविदस्त्रमन्त्रं  जग्राह तस्मान्निगृहीतशापात्  ॥५९॥ एवं तयोरध्वनि दैवयोगादासेदुषो: सख्यमचिन्त्यहेतु । एको ययौ चैत्ररथप्रदेशान् सौराज्यरम्यानपरो विदर्भान् ॥६०॥ तं  तस्थिवांसं नगरोपकण्ठे  तदागमारूढगुरुप्रहर्ष:  । प्रयुज्जगाम  क्रथकैशिकेन्द्रश्चन्द्र:  प्रवृद्धोर्मिरिवोर्मिमाली ॥६१॥ प्रवेश्य  चैनं पुरमग्रयायी नीचैस्तथोपाचरदर्पितश्री:  ।  मेने यथा तत्र जन: समेतो  वैदर्भमागन्तुमजं गॄहेशम् ॥६२॥ तस्याधिकारपुरुषै:    प्रणतै:   प्रदिष्टां  प्राग्द्वारवेदिविनिवेशितपूर्णकुम्भाम्  । रम्यां रघुप्रतिनिधि: स नवोपकार्यां बाल्यात्परामिव दशां मदनोऽध्युवास: ॥६३॥ तत्र  स्वयंवरसमाहॄतराजलोकं  कन्याललाम कमनीयमजस्य लिप्सो:     ।  भावावबोधकलुषा  दयितेव  रात्रौ निद्रा चिरेण  नयनाभिमुखी बभूव ॥६४॥ तं  कर्णभूषणनिपीडितपीवरांसं   शय्योत्तरच्छदविमर्दकृशाङ्गरागम्    ।  सूतात्मजा:   सवयस:   प्रथितप्रबोधं  प्राबोधयन्नुषसि  वाग्भिरुदारवाच: ॥६५॥ रात्रिर्गता मतिमतां वर ! मुञ्च शय्यां धात्रा द्विधैव ननु धूर्जगतो विभक्ता ।  तामेकतस्तव बिभर्ति  गुरुर्विनिद्रस्तस्या  भवानपरधुर्यपदावलम्बी ॥६६॥ निद्रावशेन भवताऽप्यनवेक्षमाणा पर्युत्सुकत्वमबला निशि खण्डितेव । लक्ष्मीर्विनोदयति येन दिगन्तलम्बी सोऽपि त्वदाननरुचिं विजहाति चन्द्र: ॥६७॥  तद्वल्गुना युगपदुन्मिषितेन तावत्सद्य:  परस्परतुलामधिरोहितां  द्वे   ।   प्रस्पन्दमानपरुषेतरतारमन्तश्चक्षुस्तव   प्रचलितभ्रमरं   च   पद्मम्  ॥६८॥ वृन्ताच्छ्लथं हरति पुष्पमनोकहानां संसृज्यते सरसिजैररुणांशुभिन्नै: । स्वाभाविकं  परगुणेन  विभातवायु:  सौरभ्यमीप्सुरिव  ते  मुखमारुतस्य ॥६९॥ ताम्रोदरेषु पतितं  तरुपल्लवेषु निर्धौतहारगुलिकाविशदं  हिमाम्भ:   । आभाति  लब्धपरभागतयाऽधरोष्ठे  लीलास्मितं सदशनार्चिरिव  त्वदीयम् ॥७०॥ यावत्प्रतापनिधिराक्रमते न भानुरह्नाय तावदरुणेन तमो निरस्तम्  । आयोधनाग्रसरतां त्वयि वीर !  याते किं वा रिपूँस्तव गुरु:  स्वयमुच्छिनत्ति ॥७१॥ शय्यां जहत्युभयपक्षविनीतनिद्रा:  स्तम्बेरमामुखरशृङ्खलकर्षिणस्ते । येषां   विभान्ति  तरुणारुणरागयोगाद्भिन्नाद्रिगैरिकतटा  इव  दन्तकोशा: ॥७२॥ दीर्घेष्वमी नियमिता: पटमण्डपेषु निद्रां विहाय वनजाक्ष ! वनायुदेश्या: । वक्त्रोष्मणा मलिनयन्ति पुरोगतानि लेह्यानि सैन्धवशिलाशकलानि वाहा: ॥७३॥ भवति विरलभक्तिर्म्लानपुष्पोपहार: स्वकिरणपरिवेषोद्भेदशून्या: प्रदीपा: । अयमपि च गिरं नस्त्वत्प्रबोधप्रयुक्तामनुवदति शुकस्ते मञ्जुवाक्पञ्जरस्थ: ॥७४॥ इति विरचितवाग्भिर्बन्दिपुत्रै:  कुमार: सपदि  विगतनिद्रस्तल्पमुज्झाञ्चकार । मदपटुनिनदद्भिर्बोधितो राजहंसै: सुरगज इव गाङ्गं सैकतं सुप्रतीक: ॥७५॥ अथ विधिमवसाय्य  शास्त्रदृष्टं  दिवसमुखोचितमञ्चिताक्षिपक्ष्मा ।  कुशलविरचितानुकूलवेष:                                 क्षितिपसमाजमगात्स्वयंवरस्थम्   ॥७६॥  

06 November, 2010

My Emotions on festival pollution

Last Friday , we have celebrated the festival Diwali very successfully. But it is very important to view that since ancient time we have always celebrated our all festivals with ecofriendly atmosphere. We have never forget our nature. But present time now we are forgetting our nature and culture.In this festival, we have lost very dangerous air-pollution in atmosphere. Though we are knowing that we all are suffering from global warming i.e. we become uncareful for our atmosphere and climate.
      So it is request to all that we should never forget our nature and its natural glamor. It is our duty that we spend some time in natural atmosphere and be careful for its safety .